पाठ्यक्रम: GS3/विज्ञान प्रौद्योगिकी
संदर्भ
- कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) और डेटा सेंटरों के तीव्र विस्तार ने उनके छिपे हुए जल फुटप्रिंट को उजागर किया है। इससे भूजल के क्षरण, शीतलन की आवश्यकताओं तथा जल-संकटग्रस्त क्षेत्रों में सततता को लेकर चिंताएँ बढ़ी हैं।
AI का उभरता जल फुटप्रिंट
- कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) पर प्रायः कंप्यूटिंग क्षमता और विद्युत खपत के संदर्भ में चर्चा की जाती है, लेकिन डेटा सेंटरों के संचालन के लिए जल भी उतना ही महत्वपूर्ण संसाधन है, विशेषकर उच्च-घनत्व वाली कंप्यूटिंग प्रणालियों को ठंडा रखने के लिए।
- कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय के एक अनुमान के अनुसार, लगभग 20–50 आदान-प्रदान वाली एक सामान्य ChatGPT बातचीत का जल फुटप्रिंट स्थान, शीतलन तकनीक और विद्युत ऊर्जा के मिश्रण के आधार पर लगभग 0.5 लीटर तक हो सकता है।
- यह दर्शाता है कि देखने में अमूर्त डिजिटल सेवाओं का भी भौतिक पर्यावरणीय प्रभाव होता है।
- संयुक्त राष्ट्र के एक आकलन के अनुसार, वर्ष 2025 में डेटा सेंटरों का जल फुटप्रिंट लगभग 4.5 ट्रिलियन लीटर हो सकता है, जो वर्ष 2030 तक बढ़कर 9.3 ट्रिलियन लीटर तक पहुँच सकता है।
- यह जल फुटप्रिंट प्रत्यक्ष रूप से शीतलन की आवश्यकताओं तथा अप्रत्यक्ष रूप से विद्युत उत्पादन में प्रयुक्त जल—दोनों से उत्पन्न होता है।
भारत में डेटा सेंटरों का विस्तार
- तीव्रता से हो रहे डिजिटलीकरण, क्लाउड कंप्यूटिंग, AI के बढ़ते उपयोग और डेटा उत्पादन में वृद्धि के कारण भारत एक प्रमुख वैश्विक डेटा सेंटर हब के रूप में उभर रहा है।
- डेटा सेंटर क्षमता वर्ष 2020 में लगभग 375 MW से बढ़कर वर्ष 2025 में लगभग 1,500 MW हो गई है और वर्ष 2031–32 तक इसके 13.56 GW तक पहुँचने का अनुमान है।
- उदाहरण के लिए, आंध्र प्रदेश की डेटा सेंटर नीति 4.0 में GST प्रतिपूर्ति और स्टांप शुल्क में छूट जैसे प्रोत्साहन प्रदान किए गए हैं।
- उत्तर प्रदेश की 2026 की नीति का लक्ष्य 2 GW से अधिक अतिरिक्त क्षमता विकसित करना है।
- गुजरात की 2026–29 की नीति का लक्ष्य 7.5 GW क्षमता तथा लगभग ₹6 लाख करोड़ के निवेश को आकर्षित करना है।
प्रमुख मुद्दे एवं चिंताएँ
- भूजल पर दबाव: केंद्रीय भूजल बोर्ड (CGWB) के वर्ष 2024 के आकलन के अनुसार, भारत में भूजल दोहन का स्तर 60.47% है, जबकि 11.1% आकलन इकाइयों को अतिदोहित श्रेणी में रखा गया है।
- जब डेटा सेंटर पहले से ही जल-संकटग्रस्त शहरी क्षेत्रों में केंद्रित होते हैं, तब यह चुनौती अधिक गंभीर हो जाती है।
- उदाहरण के लिए:
- गौतम बुद्ध नगर में अनेक वर्तमान और आगामी डेटा सेंटर हैं, जबकि यहाँ भूजल दोहन का स्तर 104.79% आकलित किया गया है।
- हैदराबाद को भी अतिदोहित क्षेत्र के रूप में वर्गीकृत किया गया है। आंध्र प्रदेश की राज्य-स्तरीय भूजल स्थिति अपेक्षाकृत बेहतर होने के बावजूद विशाखापत्तनम में स्थानीय जल संसाधनों पर दबाव बना हुआ है।
- पारदर्शिता का अभाव: अनेक डेटा सेंटर अपने मासिक या अधिकतम जल उपभोग, जल के स्रोत अथवा पेयजल, भूजल और पुनर्चक्रित जल के उपयोग के अनुपात का सार्वजनिक रूप से खुलासा नहीं करते हैं।
- इससे उनके स्थानीय पर्यावरणीय प्रभाव का सार्थक आकलन करना कठिन हो जाता है।
- जल-ऊर्जा संबंध: डेटा सेंटरों में विद्युत की अत्यधिक खपत होती है। स्वयं विद्युत उत्पादन में भी जल की खपत हो सकती है, जिससे जल और ऊर्जा से जुड़ी एक परस्पर संबद्ध चुनौती उत्पन्न होती है।
- जल-गहन शीतलन प्रणालियों पर अत्यधिक निर्भरता औद्योगिक और घरेलू आवश्यकताओं के बीच जल के लिए प्रतिस्पर्धा को भी बढ़ा सकती है।
- तटीय जोखिम: समुद्री जल आधारित शीतलन से स्वच्छ जल पर निर्भरता कम की जा सकती है। हालांकि, यदि सघन लवणीय अपशिष्ट का उचित प्रबंधन न किया जाए, तो उसके निष्कासन से समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र प्रभावित हो सकते हैं।
प्रयास एवं पहल
- आंध्र प्रदेश की डेटा सेंटर नीति 4.0 बड़े डेटा सेंटर परियोजनाओं के लिए वित्तीय और ऊर्जा संबंधी प्रोत्साहन प्रदान करती है।
- उत्तर प्रदेश की डेटा सेंटर नीति, 2026 का उद्देश्य क्षमता में 2 GW से अधिक की वृद्धि करना है।
- गुजरात की डेटा सेंटर नीति, 2026–29 का लक्ष्य 7.5 GW क्षमता प्राप्त करना है।
- कंपनियाँ समुद्री जल आधारित शीतलन की संभावनाएँ खोज रही हैं, जिसका उदाहरण फिनलैंड में गूगल का डेटा सेंटर है।
- पुनर्चक्रित अपशिष्ट जल, बंद-चक्र शीतलन तथा ऊर्जा-कुशल शीतलन प्रौद्योगिकियों के व्यापक उपयोग से स्वच्छ जल पर निर्भरता कम की जा सकती है।
आगे की राह
- भारत को जल की उपलब्धता को बाह्य कारक मानने के बजाय ‘जल सुरक्षा के साथ डिजिटल विकास’ के दृष्टिकोण को अपनाना चाहिए।
- अनिवार्य प्रकटीकरण: डेटा सेंटरों को अपने मासिक और अधिकतम जल उपभोग, स्रोत के अनुसार जल उपयोग तथा प्रति इकाई कंप्यूटिंग जल-तीव्रता की जानकारी सार्वजनिक करना अनिवार्य किया जाना चाहिए।
- जल-संकट आधारित विनियमन: अतिदोहित या जल-संकटग्रस्त क्षेत्रों में स्थापित होने वाली नई परियोजनाओं के लिए अधिक कठोर पर्यावरणीय और भूजल संबंधी स्वीकृतियाँ अनिवार्य की जानी चाहिए।
- गैर-पेयजल को प्राथमिकता: जहाँ तकनीकी रूप से संभव हो, वहाँ शीतलन के लिए उपचारित अपशिष्ट जल और पुनर्चक्रित जल के अधिक उपयोग को अनिवार्य किया जाना चाहिए।
- जल-कुशल शीतलन को बढ़ावा: स्थानीय जलवायु परिस्थितियों के अनुरूप बंद-चक्र, तरल, शुष्क और हाइब्रिड शीतलन प्रौद्योगिकियों को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।
- एकीकृत नियोजन: डेटा सेंटरों की स्वीकृति प्रदान करते समय क्षेत्र की संयुक्त जल-ऊर्जा-भूमि आवश्यकताओं तथा पारिस्थितिक वहन क्षमता को ध्यान में रखा जाना चाहिए।
- जिम्मेदार तटीय शीतलन: समुद्री जल आधारित प्रणालियों में कठोर लवणीय अपशिष्ट उपचार तथा समुद्री पर्यावरण पर प्रभाव की नियमित निगरानी को अनिवार्य रूप से शामिल किया जाना चाहिए।
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